विकास को जनांदोलन बनाकर ही सफल और साकार हो सकता आत्मनिर्भर भारत का सपना -बढ़ती रेल,सड़क,वायु और समुद्री जहाज दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाना जरुरी

Khozmaster
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नागपुर. आनन्दमनोहर जोशी
प्राकृतिक आपदा, अतिवृष्टि से हो रही दुर्घटनाओं को रोकने के लिए आधुनिक युग में मशीन,यंत्र,मानवीय संस्थानों के जरिये सुधार संभव है.
उसी तरह सामान्य जीवन में हो रही मानवीय त्रुटि के चलते दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाना भी जरूरी है.हमारे देश में समृद्धि एक्सप्रेस हाईवे, टनल,गुफाओं के नीचे से रेलवे विभाग ने रेल पटरियां बनाई है.
उसी तरह हज़ारों किलोमीटर ऊपर आकाश से हवाई जहाज भी उड़ाए जा रहे है. साथ साथ समुद्री महामार्ग के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुँचने के लिए बड़े बड़े पानी के जहाजों का निर्माण किया जा रहा है.
अब जरुरत है सम्बंधित तकनिकी योग्यता प्राप्त लोगों की जो आकस्मिक दुर्घटनाओं पर नियंत्रण कर सके. इसके लिए जल,थल,नभ,वायु सभी विभागों में कुशल श्रमिकों की नियुक्तियां करके सभी क्षेत्र में जनांदोलन के सामान सुरक्षा,आत्मरक्षा के सुविधा जनक उपाय ढूंढने होंगे.
140 करोड़ देशवासियों की समस्याएं हल करने के लिए लाखों नागरिकों का सहयोग लेकर समस्याओं को हल करना संभव है.
आज देशभर में सैकड़ों किलोमीटर की सड़कें,रेल पटरियां बिछा दी गई है.हज़ारों हवाईजहाजों के जरिये लाखों नागरिक आकाश मार्ग से सफर कर रहे है.
परन्तु बीते वर्षों में सड़क,रेल,वायु, समुद्र दुर्घटनाओं में निर्दोष नागरिकों, प्राणियों,पक्षियों,जीवजंतुओं की प्राण हानि भी हुई है. जंगल के बीच से सड़क ,रेल मार्ग में नीलगाय,जानवर बीच में आ जाने से दुर्घटनाएं घट रही है..सड़कों पर श्वान भी विचरण करते है. नागपुर के अमरावती रोड, नागपुर मुम्बई समृद्धि एक्सप्रेस हाईवे पर भी हृदयविदारक दुर्घटनाएं हो चुकी है.
जिसमें मानवीय भूल,गलत लोगों को लाइसेंस परवाना देने से वाहनों को तेज गति से चलने आदि तकनीकी खामियां है.जिन्हें वर्तमान आधुनिक युग में सहज ही दूर किया जा सकता है.
इसके लिए जल,थल,वायु,रेल सभी सम्बन्धित विभागों में कार्यरत लोगों को आवश्यक तंत्रज्ञान देना होगा.
जिससे आनेवाले समय में हो रही दुर्घटनाओं को टाला जा सकता है. इससे निर्दोष लोगों की जान बचाई जा सकती है.
विकास को जनांदोलन बनाकर आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न साकार हो सकता है.इसके लिए सबके साथ,सबके विश्वास,सबके प्रयास की जरुरत है. तब कहीं जाकर सबका विकास होगा.

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