नागपुर में मोहम्मद रफी की 45वीं पुण्यतिथि पर ‘वो जब याद आये’ — सुरों की ऐसी श्रद्धांजलि जिसने हर दिल को छू लिया

Khozmaster
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नागपुर में मोहम्मद रफी की 45वीं पुण्यतिथि पर ‘वो जब याद आये’ — सुरों की ऐसी श्रद्धांजलि जिसने हर दिल को छू लिया

नागपुर, 31 जुलाई:
संगीत प्रेमियों के लिए 31 जुलाई की शाम नागपुर की यादगार शामों में से एक बन गई, जब सीताबर्डी स्थित मधुरम हॉल में मोहम्मद रफी की 45वीं पुण्यतिथि के अवसर पर ‘वो जब याद आये’ नामक संगीतमय श्रद्धांजलि का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम श्रीरागम संगीत समूह द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसने श्रोताओं को रफी साहेब के अमर नग़मों की मधुर यात्रा पर ले चलते हुए भावनाओं से भर दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन से हुई, जिसके बाद संचालन की बागडोर संभाली प्रसन्न नायर ने। उन्होंने न केवल मंच को जीवंत बनाए रखा, बल्कि अपनी प्रस्तुति से श्रोताओं को मोहम्मद रफी की भावनात्मक गहराइयों से भी जोड़ा।

एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियों ने माहौल को संगीतमय कर दिया — सागर मधुमटके की भावपूर्ण प्रस्तुति ‘अकेले हैं चले आओ’, अश्पाक शेख की मधुर आवाज़ में ‘तू गंगा की मौज’, और प्रमोद गाडेकर का मोहक ‘नज़र ना लग जाए’ ने दर्शकों को पुराने दौर में लौटा दिया।

प्रसन्न नायर की आवाज़ में जब ‘एहसान तेरा होगा मुझ पर’ गूंजा, तो पूरा हॉल तालियों की गूंज से भर गया। वहीं संजय पोटदुःखे की ‘मेरा तो जो भी कदम’ ने श्रोताओं को स्तब्ध कर दिया।

जोड़ी में भी शानदार प्रस्तुतियाँ देखने को मिलीं — स्वाती खडसे और प्रमोद गाडेकर के ‘पट्टा पट्टा’, गरिमा शर्मा और प्रसन्न नायर के ‘तुम्हारी नजर क्यों खफा हो गई’, और फिर ‘डफलीवाले’ गीत पर की गई शानदार प्रस्तुति ने कार्यक्रम को ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।

इस विशेष संध्या का एक और भावनात्मक क्षण तब आया जब डॉ. मनोज साल्पेकर ने रफी साहेब के जीवन से जुड़े प्रेरक संस्मरण साझा किए। उन्होंने रफी साहेब की सादगी, संघर्ष और सुरों के प्रति उनकी निष्ठा को भावुक अंदाज़ में सामने रखा।

कार्यक्रम का समापन प्रसन्न नायर के धन्यवाद ज्ञापन और रफी साहेब के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि के साथ हुआ।

‘वो जब याद आये’ केवल एक संगीत कार्यक्रम नहीं था, बल्कि रफी साहेब की विरासत को संजोने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सजीव माध्यम बन गया। श्रोताओं के चेहरों पर मुस्कान और आंखों में नमी ने यह सिद्ध कर दिया कि रफी की आवाज़ आज भी उतनी ही ताज़ा है, जितनी वह दशकों पहले हुआ करती थी।

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