जो बच्चों को भूखा नहीं सोने देते थे, आज वही अपने हक़ के लिए भूखे बैठे हैं!

Khozmaster
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जो बच्चों को भूखा नहीं सोने देते थे, आज वही अपने हक़ के लिए भूखे बैठे हैं!

आकाश देशभ्रतार — एक साधारण नाम, लेकिन एक बड़ा काम। उन्होंने और उनकी संस्था ‘स्नेहा महिला बचत गट’ ने संत मुक्ताबाई मागासवर्गीय मुलींचे शासकीय वसतीगृह, सिविल लाईन्स, नागपूर में करीब 100 बेटियों को रोज़ाना भरपेट भोजन दिया।

यह जिम्मेदारी उन्हें ब्रिस्क कंपनी ने सौंपी थी, जिसे सरकार से यह ठेका मिला था। प्रति विद्यार्थी ₹3,900 की दर तय हुई थी। लेकिन बीते चार महीनों से ब्रिस्क कंपनी ने एक रुपया तक नहीं चुकाया — और आज उन पर ₹14,44,000 बकाया हैं।

आकाश देशभ्रतार ने हार नहीं मानी — उन्होंने उधार लेकर भी बेटियों के लिए चूल्हा जलाए रखा। पर जब कर्ज़ ने कमर तोड़ दी, तो अपना घर तक बेचना पड़ा। सब कुछ गंवा दिया, लेकिन बच्चों को भूखा नहीं रखा।

जब उम्मीद टूटने लगी तो आकाश देशभ्रतार ने समाज कल्याण कार्यालय नागपूर में शिकायत दर्ज कराई — पर न्याय के बदले उनका काम ही बंद करवा दिया गया। उल्टा अब रोज़गार भी छिन गया और घर भी चला गया।

आकाश देशभ्रतार अकेले नहीं हैं — उनके जैसे कई भोजन ठेकेदार ब्रिस्क कंपनी से बकाया राशियों के लिए दर-दर भटक रहे हैं। अब थक-हारकर आकाश देशभ्रतार भीम आर्मी के सौजन्य से समाज कल्याण कार्यालय, नागपूर के सामने धरने पर बैठे हैं। उनके साथ कई और ठेकेदार भी अपनी मेहनत की कमाई के लिए इंसाफ़ मांग रहे हैं।

जिन हाथों ने बच्चों की थाली भरी, आज वही हाथ न्याय के लिए उठे हैं।

सवाल यह है — क्या इनकी आवाज़ कोई सुनेगा? क्या मेहनतकश लोगों को उनका हक़ मिलेगा? या फिर रोटी परोसने वाले खुद भूख से हार जाएंगे?

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