“प्राप्त से अधिक देना ही भारत का संस्कार है” – सुमंत आमशेकर ✦ स्व. शंकरराव तत्त्ववादी की स्मृति में परिवार द्वारा विभिन्न संस्थाओं को समर्पण निधि प्रदान

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“प्राप्त से अधिक देना ही भारत का संस्कार है” – सुमंत आमशेकर

✦ स्व. शंकरराव तत्त्ववादी की स्मृति में परिवार द्वारा विभिन्न संस्थाओं को समर्पण निधि प्रदान

 

नागपुर | 18 जुलाई

“प्राप्त से अधिक लौटाने की भावना ही भारत की आत्मा है — यही हमारे देश की सच्ची सांस्कृतिक विरासत है,” ऐसा प्रेरणादायी वक्तव्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पश्चिम क्षेत्र प्रचारक सुमंत आमशेकर ने आज यहाँ व्यक्त किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक स्वर्गीय शंकरराव तत्त्ववादी के हाल ही में हुए निधन के उपरांत, उनके परिवार की ओर से अनेक सामाजिक व रचनात्मक संस्थाओं को समर्पण निधि स्वरूप आर्थिक सहयोग प्रदान किया गया। यह भावपूर्ण कार्यक्रम नागपुर के रेशीमबाग स्थित स्मृति मंदिर परिसर में स्थित मधुकर भवन में शुक्रवार की संध्या संपन्न हुआ।

इस अवसर पर मंच पर उपस्थित रहे —

राष्ट्रसेविका समिति की प्रमुख संचालिका शांताक्का,संघ के विदर्भ प्रांत सह-संघचालक श्रीधर गाडगे, महानगर संघचालक राजेश लोया, तथा डॉ. वसंत तत्त्ववादी।

सुमंत आमशेकर ने विवेकानंद केंद्र की एक प्रार्थना पंक्ति उद्धृत की —”जीवने यावद दानं स्यात्, प्रदानं ततोऽधिकम्” —और कहा,

“हे प्रभु, हमें इतनी क्षमता दो कि हम जीवन में जितना मिला है, उससे अधिक दे सकें — यही हमारी प्रार्थना है। आज हम इस प्रार्थना को साकार होते देख रहे हैं। ‘प्राप्त से अधिक देने’ की यह भावना ही भारत है, यही उसका संस्कार है। और जब यह भावना किसी परिवार के आचरण में उतरती है, तो वह पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाती है।”

शांताक्का ने इस अवसर पर स्व. शंकरराव तत्त्ववादी से जुड़े आत्मीय संस्मरण साझा किए। उन्होंने कहा —

“हमारा रिश्ता भाई-बहन जैसा था। वे रक्षाबंधन और भाऊबीज जैसे पर्वों पर हमेशा आते थे। उनका अध्ययन अत्यंत गहन और व्यापक था। बौद्धिक चर्चाओं में जब कोई प्रश्न पूछा जाता, तो वे न केवल उत्तर देते, बल्कि उससे जुड़े श्लोक, सात-आठ पुस्तकें, उनके लेखक और संदर्भ भी सहजता से बताते थे — जिससे उन्हें सुनकर पढ़ने की प्रेरणा मिलती थी। वे जहाँ भी जाते, वह परिवार उनका बन जाता। वे सबके साथ आत्मीयता से जुड़ते।”

उन्होंने आगे कहा —

“शंकररावजी हमेशा विनम्रता से कहते थे — ‘जो कुछ भी हूँ, वह संघ के कारण हूँ।’ संघ की प्रतिज्ञा में जो कहा गया है — ‘देशसेवा का जो व्रत लिया है, उसका आजन्म पालन करूंगा’ — शंकररावजी ने इसे पूर्ण निष्ठा से निभाया। आज जो समर्पण निधि विभिन्न संस्थाओं को दी जा रही है, वह उनके इसी जीवनव्रत की अभिव्यक्ति है।”

शंकररावजी के भतीजे किशोर तत्त्ववादी ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए उनके जीवन की स्मृतियाँ साझा कीं।

जिन संस्थाओं को समर्पण निधि प्रदान की गई, वे हैं —

देवी अहिल्या स्मारक समिति, हेडगेवार स्मारक समिति, लोककल्याण समिति, जनकल्याणकारी समिति, डॉ. हेडगेवार जन्मशताब्दी समिति (अकोला), विद्या भारती, उत्थान चैरिटेबल फाउंडेशन, संज्ञा चैतन्य, तथा संवर्धिनी न्यास।

इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संघ के प्रचारक, स्वयंसेवक तथा तत्त्ववादीपरिवार के सदस्य उपस्थित रहे।

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