ताजबाग़ से उठी जनकल्याण की पुकार: नितिन गडकरी ने जताई गरीबों के लिए सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की भावना, प्यारे खान साहब के नेतृत्व में भव्य उर्स का आयोजन
नागपुर | विशेष संवाददाता
नागपुर की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरती पर स्थित बड़ा ताजबाग़ रविवार की रात एक बार फिर श्रद्धा, सौहार्द और समाजसेवा के दिव्य संगम का साक्षी बना। अवसर था हज़रत संत बाबा ताजुद्दीन औलिया के 103वें उर्स मुबारक का — और क्षण विशेष बना जब केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री माननीय श्री नितिन गडकरी ने दरगाह पर पहुंचकर सच्चे मन से हाज़िरी दी।
बाबा की मजार शरीफ़ पर चादर चढ़ाकर इबादत करते हुए श्री गडकरी ने न केवल श्रद्धा व्यक्त की, बल्कि एक ऐसा संकल्प भी दोहराया, जो आने वाले समय में क्षेत्र के हज़ारों गरीबों के लिए राहत का कारण बन सकता है।
“ताजबाग़ मेरे लिए केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का स्थल नहीं, बल्कि जनसेवा की प्रेरणा है। इस पवित्र परिसर का रूपांतरण भव्य हुआ है, अब मेरी दिली इच्छा है कि यहां एक आधुनिक, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की स्थापना हो — जो बाबा की कृपा से ज़रूरतमंदों की सेवा कर सके,”— ऐसा गहन भाव से श्री गडकरी ने कहा।

प्यारे जिया खान साहब का नेतृत्व: श्रद्धा और संगठन का प्रतीक
इस भव्य आयोजन के केंद्र में थे ताजबाग़ ट्रस्ट के सम्माननीय चेयरमैन श्री प्यारे जिया खान साहब, जिनके कुशल नेतृत्व, संतुलित समन्वय और आध्यात्मिक समर्पण ने उर्स को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया।
प्यारे खान साहब ने गडकरी जी का आत्मीय स्वागत किया और ट्रस्ट की ओर से बाबा की शिक्षाओं को जनहित में बदलने के संकल्प को दोहराया। उनका शांत, संयमी और दूरदर्शी व्यक्तित्व पूरे आयोजन के दौरान हर क्षण में प्रतिबिंबित होता रहा।
ट्रस्ट के पदाधिकारी और ट्रस्टीगण की गरिमामयी उपस्थिति

उर्स समारोह में ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारीगण विशेष रूप से उपस्थित रहे:
सचिव श्री ताज अहमद राजा साहब,
उपाध्यक्ष डॉ. सुरेंद्र जिचकार साहब,
ट्रस्टीगण — फ़ारूकभाई बावला, हाजी इमरान खान ताज़ी, गजेंद्रपाल सिंह लोहिया, और मुस्तफाभाई टोपीवाला।
इन सभी ने संयम, समर्पण और सेवाभाव से कार्यक्रम की संपूर्ण व्यवस्था को सफलतापूर्वक संपन्न किया।
103वें उर्स मुबारक में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
देशभर से आए हज़ारों श्रद्धालुओं ने बाबा की मजार पर हाज़िरी दी, चादर चढ़ाई और अमन-चैन की दुआ मांगी। रातभर कव्वालियों, सूफ़ी संगीत और इबादतों से ताजबाग़ की फिज़ा रूहानियत में डूबी रही।
यह आयोजन केवल धार्मिक श्रद्धा का नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के आह्वान का प्रतीक बन गया — जहाँ एक राष्ट्रीय नेता की सेवा-दृष्टि और एक ट्रस्ट के आध्यात्मिक नेतृत्व ने मिलकर जनकल्याण की नई राह खोलने की नींव रख दी।

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