त्यौहार की जिम्मेदारी में दिन-रात खड़े पुलिसकर्मी, लेकिन थकान और बीमारियों से टूट रहा उनका शरीर – कौन सुनेगा इनकी पीड़ा?
नागपुर :
शहर में गणेशोत्सव और ईद का उल्लास चरम पर है। सड़कों पर भीड़ है, मंदिर-मस्जिद रोशनी से जगमगा रहे हैं और घरों में खुशियाँ हैं। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा वर्ग है जो मुस्कान के पीछे अपनी थकान और दर्द छुपाकर ड्यूटी पर खड़ा है — हमारे पुलिसकर्मी।
दिन-रात ड्यूटी, नींद और आराम छीन रही है जिंदगी
सुबह से रात और रात से सुबह तक लगातार ड्यूटी। त्योहारों के साथ-साथ वीआईपी दौरों का दबाव। कभी आदेश वॉकी-टॉकी से, तो कभी अचानक मोबाइल पर कॉल। थका हुआ शरीर भी चाहे चूर-चूर हो, लेकिन ड्यूटी तो निभानी ही है। क्योंकि पुलिसकर्मी के लिए “ना” कहना मुमकिन ही नहीं।
सुविधाओं का अभाव, बीमारियों का शिकार
जगह-जगह चौक पर तैनात इन पुलिसवालों के लिए न पानी की सुविधा है, न शौचालय की। घंटों भूखे-प्यासे खड़े रहना उनकी मजबूरी है।
घर से दूर होने पर उन्हें जो भी सड़क किनारे मिलता है, वही खा लेना पड़ता है। कई बार बासी तेल में तले हुए समोसे और कचौरी ही उनका सहारा बनते हैं। नतीजा – फैटी लिवर, एसिडिटी और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ।
कई पुलिसकर्मी तो दवा की दुकान से गोली लेकर काम चलाते हैं, क्योंकि डॉक्टर के पास जाने का समय ही कहाँ है?
बढ़ती उम्र, बढ़ती बीमारियाँ – लेकिन जांच का कोई इंतज़ाम नहीं
40 वर्ष से ऊपर के पुलिसकर्मियों में डायबिटीज और ब्लड प्रेशर की समस्या आम है। लेकिन स्वास्थ्य जांच की कोई व्यवस्था न होने से उनकी हालत और बिगड़ती जा रही है। ज़रूरत है कि पुलिस प्रशासन कम से कम कार्यालयों में नियमित बीपी और शुगर जांच की सुविधा उपलब्ध कराए।
अनुशासन की बेड़ियों में जकड़े
पुलिस एक अनुशासित बल है। वे न तो यूनियन बना सकते हैं, न हड़ताल कर सकते हैं। अपनी तकलीफ़ न मीडिया में कह सकते हैं, न सरकार तक पहुँचा सकते हैं। वे दंगे-फसाद हो या आतंक का खतरा, अपनी जान दाँव पर लगाकर लोगों की जान और चैन बचाते हैं।
लेकिन जब बात उनकी तकलीफ़ और स्वास्थ्य की आती है, तो उनकी आवाज़ कहीं सुनाई नहीं देती।
सरकार और अधिकारियों से अपील
त्योहार मनाने वाली भीड़ शायद इनकी पीड़ा नहीं देख पाती। लेकिन सच्चाई यह है कि इन पुलिसकर्मियों का तनाव और ओवरटाइम उनकी सेहत को धीरे-धीरे खोखला कर रहा है।
आज ज़रूरत इस बात की है कि सरकार और वरिष्ठ अधिकारी सिर्फ आदेश और ड्यूटी न देखें, बल्कि उन चेहरों की थकान भी देखें जो हमारे लिए चौबीसों घंटे खड़े रहते हैं।
पुलिसकर्मी भी इंसान हैं – उन्हें भी आराम, सेहत और सम्मान की उतनी ही ज़रूरत है जितनी किसी और को।
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