“वर्तमान समय में अंतर्विषयक सम्मेलनों के माध्यम से राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा आवश्यक” – डॉ. आशिष देशमुख
नागपुर (महादुला-कोराडी): तायवाडे कॉलेज, महादुला-कोराडी और अद्वय मल्टीपर्पज फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “उदयोन्मुख भारत: राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और प्रशासन क्षेत्र में परिवर्तन” विषय पर डॉ. पंजाबराव देशमुख सभागार में सफलतापूर्वक आयोजित किया गया।
कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में कलमेश्वर-सावनेर विधानसभा क्षेत्र के विधायक डॉ. आशिष देशमुख उपस्थित रहे। प्रमुख वक्ता के रूप में जी. एच. रायसोनी विश्वविद्यालय, अमरावती के कुलगुरु डॉ. विनायक देशपांडे शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता सच्चिदानंद शिक्षण संस्था के अध्यक्ष डॉ. बबनराव तायवाडे ने की। इस अवसर पर महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. शरयू तायवाडे, सम्मेलन की निदेशक डॉ. वर्षा वैद्य, समन्वयक डॉ. वकील शेख, डॉ. चंद्रशेखर गीते, आयोजन सचिव डॉ. शरद डवरे, कुलदीप सोनकुसरे तथा आईक्यूएसी समन्वयक डॉ. गिरीश काटकर सहित अन्य गणमान्य उपस्थित थे।
प्राचार्य डॉ. शरयू तायवाडे ने प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए सम्मेलन के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। अपने उद्घाटन संबोधन में विधायक डॉ. आशिष देशमुख ने कहा कि वर्तमान समय में इस प्रकार के सम्मेलनों के माध्यम से राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर सार्थक चर्चा करना अत्यंत आवश्यक है।
मुख्य वक्ता डॉ. विनायक देशपांडे ने अपने संबोधन में कहा कि विभिन्न कालखंडों में अलग-अलग राजनीतिक दलों का वर्चस्व रहा है, जिसके पीछे के कारणों का अध्ययन जरूरी है। उन्होंने कहा कि समाज में हो रहे परिवर्तन का प्रतिबिंब राजनीति में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य देश की प्रगति में सहायक सिद्ध होगा।
अध्यक्षीय भाषण में डॉ. बबनराव तायवाडे ने सम्मेलन के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि लगभग 200 शोधपत्रों का प्रस्तुत होना इस विषय की प्रासंगिकता को दर्शाता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के आयोजन नई पीढ़ी को विचार करने के लिए प्रेरित करेंगे।
सम्मेलन के पहले सत्र में “उदयोन्मुख भारत: राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और प्रशासन” विषय पर विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार रखे। डॉ. दिगंबर तंगलवाड ने कहा कि वर्तमान में लोग विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं और परिवर्तन की ओर अग्रसर हैं। डॉ. सुरेश मैंद, डॉ. चित्रेश सोनी और डॉ. अनुपकुमार सिंह ने भी अपने विचार प्रस्तुत करते हुए लोकतंत्र, सामाजिक परिवर्तन और नई शिक्षा नीति के महत्व पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. सारिका दिवे एवं कु. अश्विनी खापर्डे ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन कुलदीप सोनकुसरे और डॉ. विष्णू चव्हाण ने किया।
इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कुल 319 प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही, जिससे कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

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