शिक्षकों ने उठाया गंभीर सवाल
हम शिक्षक हैं या डेटा एंट्री ऑपरेटर?
शिक्षकों पर 91 तरह के ऑनलाइन और गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ
शिक्षा देना जहां शिक्षकों का मूल कर्तव्य है, वहीं आज जिला परिषद, नगर पालिका और निजी स्कूलों के शिक्षक डिजिटल कागजी कार्रवाई के जाल में पूरी तरह उलझ चुके हैं। तीन–चार नहीं, बल्कि 51 से अधिक ऐप्स और वेबसाइट्स पर जानकारी भरने के साथ-साथ अन्य 40 से ज्यादा गैर-शैक्षणिक कार्य, यानी कुल 91 प्रकार के ऑनलाइन और अतिरिक्त काम शिक्षकों पर थोप दिए गए हैं। इससे आक्रोशित शिक्षकों ने सवाल उठाया है कि “हम शिक्षक हैं या डेटा एंट्री ऑपरेटर?”
शिक्षण कार्य छोड़कर दिन का बड़ा हिस्सा विभिन्न ऐप्स पर डेटा भरने में ही खर्च हो रहा है, जिससे शिक्षकों में शासन के प्रति गहरी नाराज़गी देखी जा रही है। छात्रों की उपस्थिति, मध्याह्न भोजन, शैक्षणिक प्रगति, छात्रवृत्ति, खेलकूद, स्वास्थ्य, वृक्षारोपण, चुनाव प्रक्रिया, सामाजिक अभियान और डिजिटल प्रशिक्षण जैसी अनेक योजनाओं के लिए अलग–अलग ऐप्स और पोर्टल्स बनाए गए हैं।
इनमें पीएम पोषण, स्विफ्टचैट, विद्यांजलि, निपुण महाराष्ट्र, दीक्षा, फिरकी, आई-गॉट कर्मयोगी, सरल के 12 से अधिक मॉड्यूल, यू-डाइस प्लस के विभिन्न सेक्शन, शालार्थ, महाडीबीटी, पीएफएमएस, डिजिलॉकर, बीएलओ, मतदाता सहायता, फिट इंडिया, खेलो इंडिया, पीएम श्री स्कूल, नवोदय, एनएमएमएस छात्रवृत्ति और ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। हर योजना के लिए अलग-अलग जानकारी भरना शिक्षकों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है।
शिक्षकों का कहना है कि अब कक्षा में पढ़ाने के लिए समय कम और मोबाइल–लैपटॉप पर डेटा भरने के लिए समय अधिक देना पड़ रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी गंभीर
हर ऐप के लिए अलग पंजीकरण, अलग लॉग-इन, अलग पासवर्ड और अलग समय-सीमा ने शिक्षकों को भ्रमित कर दिया है। सुबह स्कूल, दोपहर में पढ़ाई, शाम को कागजी काम और रात तक मोबाइल पर डेटा एंट्री—यही शिक्षकों की दिनचर्या बन चुकी है।
कई बार एक ही जानकारी को बार-बार अलग-अलग ऐप्स पर दर्ज करना पड़ता है, जिससे काम का दबाव कई गुना बढ़ गया है। ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में हालात और भी बदतर हैं। सीमित इंटरनेट सुविधा के बावजूद “तत्काल डेटा अपलोड करें” जैसे आदेश जारी किए जाते हैं। नेटवर्क न होना, सर्वर डाउन रहना और डेटा सेव न होना जैसी तकनीकी समस्याओं से शिक्षक रोज जूझ रहे हैं।
डिजिटल बोझ के कारण शिक्षकों का मूल कार्य—शिक्षण—प्रभावित हो रहा है और इसका सीधा असर विद्यार्थियों की शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।
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